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रथयात्रा को अनुमति देने का नया फैसला स्वागत योग्य, लेकिन अदालतों के यू-टर्न से उनकी साख प्रभावित होती है

महाभारत के युद्ध में कौरवों की पराजय और पुत्रों की मौत से दुखी गांधारी ने जो कहा वह हज़ारों साल बाद भारत की सुप्रीम कोर्ट का ध्येय वाक्य बन गया। ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ का महाभारत काल में अर्थ था कि जहां कृष्ण हैं, वहीं धर्म है और जहां धर्म है, वहीं विजय है।

प्रेमचंद की कहानियों में जजों को भले ही परमेश्वर का दर्ज़ा मिला हो लेकिन आधुनिक गणतंत्र में न्यायाधीश लोग संविधान, नियम और क़ानून की सीमाओं से बंधे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने पुरी की रथ यात्रा पर रोक लगाते हुए कहा था कि अगर मैं यह आदेश पारित नहीं करता तो मुझे भगवान माफ नहीं करते। अखबारों की हेडलाइन बनीं इन बातों का लिखित आदेश में जिक्र नहीं है।

जगन्नाथ यानी जगत के नाथ की ऐसी माया हुई कि 4दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट को फैसला बदल कर रथयात्रा को मंजूरी देनी पड़ी। मध्यकाल में अनेक अड़ंगों के बावजूद इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकलने के बावजूद कर्फ्यू की वजह से भक्त घरों में कैद हैं। न्याय की देवी भी गांधारी की तरह आंखों में पट्टी बांधे है, जिससे सभी को समानता से न्याय मिले।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के अनुसार गुजरात हाई कोर्ट ने अहमदाबाद में रथयात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को बदलते हुए पुरी में रथ यात्रा की अनुमति दे दी। उसी तर्ज़ पर अहमदाबाद रथ यात्रा के लिए गुजरात हाईकोर्ट द्वारा अनुमति दी जाती तो इससे न्यायिक अनुशासन में ज्यादा बढोतरी होती।  
आखिरी समय में डिजिटल अदालतों से हुए इस नाटकीय उलट-पुलट से संविधानके कई प्रावधान नजरअंदाज हुए। संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में स्थित है और किसी अन्य शहर में इसकी दूसरी पीठ नहीं है। लेकिन इस मामले में चीफ जस्टिस बोबडे नागपुर से सुनवाई, तो याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे लंदन से बहस कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला देश का कानून माना जाता है, जिसे सिर्फ संविधान के अनुच्छेद137के तहत रिव्यू यानी पुनरावलोकन प्रक्रिया या संसद के माध्यम से ही बदल सकते हैं। सात साल पहले जस्टिस राधाकृष्णन और दीपक मिश्रा की बेंच ने एक अहम् फैसला देकर कहा था कि सिविल प्रोसीजर कोड के तहत फैसले की गलतियों को ही सुधारा जा सकता है और इसकी आड़ में पूरे फैसले को बदल नहीं सकते।

रथयात्रा को अनुमति देने का नया फैसला स्वागत योग्य है। लेकिन पुराने आदेश को पलटने के लिए संशोधन आदेश पारित करने की जो प्रक्रिया अपनाई गई उसे संवैधानिक तौर पर ठीक नहीं मान सकते। देश की हज़ारों अदालतों में अंग्रेजों के समय के फैसलों के आधार पर अभी भी फैसले दिए जाते हैं।

पिछले कुछ सालों में जजों ने अपने ही अनेक फैसलों को कुछ दिनों के भीतर ही पलट दिया। इससे अदालतों की साख कमजोर होने के साथ न्यायिक अराजकता बढ़ने का खतरा बढ़ रहा है। इस पर सरकार और संसद ने भी कई बार चिंता व्यक्त की है।
लॉकडाउन के बाद चीफ जस्टिस ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को सुपर गवर्नमेंट की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से पहले उड़ीसा हाईकोर्ट के सम्मुख याचिका दायर करके रथयात्रा को रोकने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच ने 9जून को रथयात्रा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

आदेश के पैरा21में हाईकोर्ट ने कहा था कि रथयात्रा जैसे मामलों पर स्थानीय परिस्थिति के अनुसार सरकार को ही फैसले का अधिकार होना चाहिए। लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए गाइडलाइंस के पालन के लिए हाईकोर्ट ने सरकार को जवाबदेह बनाया था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की बजाय नई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जल्दबाजी में आदेश पारित कर दिए, जिसकी वजह से फैसले को 4 दिनों के भीतर पलटना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने आदेश से पुरी की रथ यात्रा से जुडी सभी धार्मिक और सेक्युलर गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सबरीमाला की तर्ज़ पर रथयात्रा के आदेश पर भी विवाद बढ़ा तो धार्मिक मामलों पर न्यायपालिका के हस्तक्षेप और क्षेत्राधिकार पर नए सवाल खड़े होंगे।
कोरोना काल में रथ के निर्माण को अनुमति देने के बावजूद प्रशासन और पुलिस ने अहमदाबाद और पुरी में रथयात्रा को अनुमति देने पर स्पष्ट निर्णय नहीं लिया। सरकारों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में निर्णय लेने में विलंब होने से अदालतों को सुपर गवर्नमेंट की भूमिका में आने में सहूलियत हो जाती है। उसके बाद देर रात की सुनवाई और वॉट्सएप से जारी अदालती फैसलों से आम जनता के साथ प्रशासन की मुश्किलें भी बढ़ती हैं।
चीन की घुसपैठ का जवाब देने के लिए अनेक उपायों के साथ ईज़ इज ऑफ डूइंग बिजनेस में क्रांतिकारी सुधार की जरूरत है, जिसमंे अदालतें भी शामिल हैं। अदालतों की अति न्यायिक सक्रियता से संसद और सरकार का रसूख कमजोर होने के साथ निर्णयन और सुधार की प्रक्रिया भी बाधित होती है।

पूर्व अटॉर्नी जनरल हरीश साल्वे ने देश में आर्थिक मंदी व जीडीपी में गिरावट के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को जिम्मेदार बताया है। क़ानून के शासन से भारत को मजबूत बनाने के लिए संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट और अदालतों को अनेक विशिष्ट अधिकार मिले हैं। रथयात्रा की तर्ज़ पर अब न्यायिक सुधार के पहियों को भी तेज गति से आगे बढ़ाया जाए तो जनता और भगवान दोनों खुश होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील।


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